
आज खेल दिवस है कल नहीं रहेगा।
अब एक साल बाद ही आएगा। लेकिन खेल दिवस पर खेलों से जुड़े विभिन्न संगठनों की दुकान आज जरूर चलेगी। इन दुकानों पर सम्मान, अवार्ड, प्रमाणपत्र के अलावा खेल सामग्री भी खूब बिकेगी। खरीदार भी हम और आप ही होंगे। इन दुकान चलाने वालों को भी पता है कि अपने दुकान की ब्रांडिंग कैसे करनी है। बस सालभर खेल और खिलाड़ियों के नाम पर पैसे वसूलो और फिर खेल दिवस पर अपनी दुकान चला लो। दुकान चलाने के नाम पर जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर के अपने शहर के या फिर आसपास के जिलों के खिलाड़ियों को सम्मानित कर दो। बस खेल एसोसिएशन और एकेडमियों की दुकान चमक उठेगी।
शहर ही नहीं पूरे देश में ऐसे हजारों, लाखों खेल संगठन होंगे।इनमें से तो एक व्यक्ति ही कई संगठन चला रहा होगा। लेकिन कितने खिलाड़ी संगठनों, संस्थाओं से निकलते है यह सब जानते है। ये खिलाड़ियों के नाम पर जिस खेल को खेल रहे है उन पर लगाम लगानी होगी। और खिलाड़ियों के भविष्य को बचाना होगा। नहीं तो इस बार तो रियो ओलंपिक में दो पदक आ गए लेकिन अगली बार का पता नहीं। आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाली हॉकी टीम को भी एयरपोर्ट पर पीछे का रास्ता देखना पड़ जाता है। देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए खेल संस्कृति को विकसित करना होगा। और इसे आदत बनानी होगी।
खिलाड़ियों को आधारभूत सुविधाएं मिले। और देश में खेल संस्कृति का विकास हो। यहीं खेल दिवस पर मेजर ध्यानचंद के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा।