बिहार में टूटने-जुड़ने का समय
कस्बाई और गंवई जनता के पास अपनी एक अलग भाषा और समझदारी होती है, खासकर राजनीति और चुनाव प्रक्रिया के लिए। हर घटना और हर प्रक्रिया के लिए उनके पास अलग शब्द होते हैं। उनकी भाषा अक्सर राजनेताओं से अलग होती है, अकादमिक दुनिया के लोगों से तो खैर अलग होती ही है। अभी बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, मगर चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दल जुट गए हैं। धन की व्यवस्था, कार्यकर्ताओं को गोलबंद करना, दल-बदल, वगैरह चुनाव पूर्व की सारी कवायदें तेज हो चुकी हैं। पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में जब हम बिहार के हाजीपुर और उसके आस-पास के इलाके में घूमे, तो पता लगा कि वहां गांवों के लोग इस दौर को ‘टूटने-जुड़ने का समय’ कहते हैं।
यह समय उनके लिए ‘टूटने-जुड़ने’ का इसलिए है, क्योंकि यह उन्हें जो लाभ हुआ, जो हानि हुई, जो उन तक पहुंचा, जो नहीं पहुंंचा, जो उनके दुख-सुख में साथ रहा, जो नहीं आया और जिसने उनकी लड़ाई लड़ी, ऐसी बातों पर सोचकर अपना मन बनाने और मन बदलने का समय है। अभी आक्रामक चुनाव प्रचार तेज नहीं हुआ है, नेताओं का आना-जाना अभी ज्यादा शुरू नहीं हुआ है, आम जनता को समझाने, रिझाने, ललचाने के आक्रामक प्रयास भी अभी शुरू नहीं हुए हैं। ऐसे में, यह आत्ममंथन आसान है। यही समय है, जब आम लोगों का आपसी राजनीतिक संवाद शुरू होता है। जिस जनता को हम अनपढ़, निरक्षर और वोट की राजनीति में जाति, धर्म और तमाम फायदों के दबाव में आकर मत देने वाली प्रजा मानते हैं, वह इसी ‘टूटने-जुड़ने’ के समय में अपने दैनिक जीवन के संघर्षों में रहते हुए आत्मनिरीक्षण करती है। इसी वक्त किसी दल से जुड़ा कार्यकर्ता और नेता दूसरे दल के कार्यों की तारीफ करता दिख जाता है। जो जाति या समूह पिछले चुनाव में किसी खास दल को वोट दे चुका होता है, वह उससे अपने असंतोष का बयान कर रहा होता है। यानी यही वह समय है, जब आम लोगों के विमर्श में वह तनाव आकार लेने लगता है, जिसे हम बाद में ‘अंडर करंट’ कहते हैं।
हाजीपुर के पास सैदुल्लापुर के शंभु पासवान दलित जाति से हैं, राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के स्थानीय युवा नेता हैं। बात शुरू होने पर पहले तो कहते हैं कि भाजपा को एक बार बिहार में भी देखना चाहिए। फिर जब बात आगे बढ़ती है, तो थोड़ी ही देर में वह जनतांत्रिक राजनीति में दलगत हितों से ऊपर उठकर अपने सामाजिक हितों के आधार पर मूल्यांकन शुरूकर देते हैं। वह कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में हम लोगों ने मोदी जी को जिताया, पर हम तक कुछ नहीं पहुंचा। स्वच्छता अभियान, मेक इन इंडिया, विदेश यात्राएं, ये सब हम गांव-कस्बे वालों के लिए क्या अर्थ रखता है? फिर वह कहते हैं कि हमारी पार्टी वैसे तो भाजपा के साथ है, लेकिन हम लोगों को चलने, बोलने और खाट पर बैठने का अधिकार तो लालू जी ने ही दिया और नीतीश जी ने स्थानीय शासन में हम लोगों की भागीदारी दी। पैसे वालों और बड़े लोगों के शासन में हम सबका क्या भला होगा? उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह आगामी चुनाव में किसे वोट देंगे, पर वह अपने मन की बात कह गए। यह टूटने-जुड़ने के समय में ही संभव है, जब लोग आक्रामक प्रचार व नेताओं के तरह-तरह के दबाव से मुक्त होकर आत्मनिरीक्षण कर अपने मन में विचार कर रहे हैं। अगर वे कहें कि अभी तो चुनाव में देर है, अभी क्या कहें, तो भ्रम में न पड़िए कि उनके भीतर कुछ नहीं घटित हो रहा। एक राजनीतिक प्रक्रिया उस वक्त भी उनके भीतर चल रही होती है। चुनाव प्रचार तेज होने पर आधार तल की जनता या तो चुप रहती है, धीमे से बोलती है या हमें भ्रम में डालने वाली उलटबांसियां सुना देती है।
दूसरी घटना बिहार के वैशाली की है। लालू यादव द्वारा अपने बेटे को वैशाली से विधानसभा उम्मीदवार घोषित करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक समूह अपनी पार्टी की आलोचना करता दिखता है। ऐसे कार्यकर्ता लालू यादव के पुत्र-पुत्री प्रेम के प्रति अति कटु दिखते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह आगामी चुनाव में भाजपा को वोट दें ही। अभी चीजें तय हो रही हैं, यह ‘टूटने-जुटने’ का समय है, खरामा-खरामा उनके मन में चीजें बन रही हैं, नागरिक और गंवई व्यक्ति अभी ‘मतदाता’ में नहीं बदला है। चुनाव की घोषणा होते ही वह मतदाता में बदल जाएगा। उसका पक्ष तय होने लगेगा। अभी वह जनतांत्रिक राजनीति में अपने लाभ-हानि को सुन-गुन रहा है।
नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए यह ‘टूटने-जुड़ने’ की प्रक्रिया थोड़ा भिन्न ढंग से चल रही होती है। जो जातियां और सामाजिक समूह पिछले विधानसभा चुनाव में उनके ‘बेस वोट’ रहे थे, उनको तो महत्व दिया ही जा रहा है, साथ ही उन्हें भी महत्व दिया जा रहा है, जो पिछले चुनाव में उनसे दूर चले गए थे। नीतीश कुमार ने बिहार में दलितों की राजनीति में महादलित की राजनीति विकसित की थी, लेकिन अब उसमें से ‘मांझी फैक्टर’ के कारण ‘मुसहर’ मत उनसे टूट सकता है। यह भांपकर दलित और महादलित कोटि की अन्य जातियों को जोड़ने में उनके नेता जुट गए हैं। हाल में हुए बिहार विधान परिषद के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की बढ़त ने जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व वाले महागठबंधन को अपने सामाजिक समीकरणों को और दुरुस्त करने का दबाव तो दे ही दिया है।
अभी हाल ही में जगजीवन राम की 29वीं पुण्यतिथि पर नीतीश कुमार और लालू यादव ने आरा के समीप चंदवा स्थित बाबूजी की समाधि पर जाकर नमन किया। साल 1990 के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव ने पहली बार एक साथ इस प्रार्थना सभा में शिकरत की। यह हम सभी जानते हैं कि बिहार के दलित मन में बाबू जगजीवन राम की कितनी प्रतीकात्मक छवियां मौजूद हैं। उन्हें लगता है कि कुछ दलित जातियों के मतदाताओं का मन उनकी इस प्रतीकात्मक सक्रियता से उनके पक्ष में एकजुट हो सकता है। कांग्रेस और उसकी नेता व जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार भी इस महागठबंधन में शामिल हैं ही। फलत: कुछ टूट रहे हैं, तो कुछ को जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। यह अभी देखना होगा कि इस तरह की राजनीति उस जनता के राजनीतिक विमर्श पर कैसा असर दिखाती है, जिसके लिए यह टूटने और जुड़ने का समय है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) साभार: हिन्दुस्तान
मंद पड़ती चमक
मंद पड़ती चमक
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में अचानक तेज गिरावट आई है। पिछले कुछ वक्त से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम भी काफी कम चल रहे हैं और आने वाले वक्त में उनके ज्यादा तेज होने की कोई आशंका फिलहाल नहीं दिखती। अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु समझौते से यह संभावना काफी मजबूत हो गई है कि ईरान पर से प्रतिबंध हटेंगे और ईरानी कच्चा तेल भी बाजार में आ जाएगा। भारत के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का है, इसलिए तेल के दाम घटने से आयात-निर्यात संतुलन या चालू खाते का हिसाब बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। आयात में दूसरा सबसे बड़ा बोझ सोने का होता है और सोने के दामों में कमी से इसका आयात बिल भी कम होगा। पहले ही पिछले साल के मुकाबले सोने का आयात इस तिमाही में कम हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में अप्रैल से जून के बीच 221 टन सोना आयात हुआ था, जिसकी कीमत 54,800 करोड़ रुपये थी। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 203 टन सोना देश में आयात हुआ है, जिसकी कीमत 46,000 करोड़ रुपये है।
सोने के दामों में तेज गिरावट की कई वजहें हैं। पहली वजह तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के दामों में रिकॉर्ड तेजी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से बेहतरी की ओर बढ़ रही है। ऐसे में, डॉलर तेजी से ऊपर जा रहा है। सामान्य नियम यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में कमी का सीधा रिश्ता अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर से है। जब भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो अपनी स्थिति सुरक्षित करने के लिए वित्तीय संस्थान और निवेशक डॉलर बेचकर सोने की खरीद करने लगते हैं, जिससे सोने के दाम बढ़ने लगते हैं। सन 2008 की आर्थिक मंदी के बाद इसीलिए सोने के दाम आसमान छूने लगे थे। जैसे-जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभलने लगी, सोने के दामों में कमी आने लगी। फिलहाल डॉलर के दामों में तेज उछाल की वजह यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व यानी वहां की केंद्रीय मुद्रा नियंत्रक एजेंसी की अध्यक्ष जेनेट येलेन ने यह घोषणा की है कि इस साल के अंत में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की खरीदारी तेज हो गई और उसके दाम बढ़ गए। इसके परिणामस्वरूप चीनी व्यापारियों ने काफी सारा सोना बेचने के लिए बाजार में डाल दिया और सोने के दाम पिछले पांच साल में सबसे निचले स्तर पर आ गए। चीन सोने का सबसे बड़ा ग्राहक है, क्योंकि चीन में भी सोने को लेकर कुछ उसी तरह का आकर्षण है, जैसे भारत में है। ऐसे में, चीन अगर बड़े पैमाने पर सोना बेचने लगे, तो कीमतों का गिरना स्वाभाविक है। इसके अलावा धीरे-धीरे शेयर बाजार में लोगों का विश्वास फिर से जमने लगा है और लोग उसमें निवेश करने लगे हैं, जिससे सोने की मांग कम हुई है।
जब दुनिया में सोने के दाम बढ़ते हैं, तब भी भारतीय सोना खरीदते हैं और दाम कम होते हैं, तब भी वे इसे खरीदने का अच्छा मौका समझते हैं। इसी वजह से सोने का दाम घट जाने से भारत में आभूषणों का व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियों के शेयर चढ़ गए हैं। सोने के दाम घटने से उनकी लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। इसके अलावा इससे यह भी उम्मीद बनी है कि सोने के आयात पर लगे प्रतिबंध कुछ ढीले पड़ेंगे। वैसे भी अब त्योहारों का मौसम बहुत दूर नहीं है। भारतीयों के सोने के प्रति आकर्षण के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। हालांकि भविष्य में जल्दी ही सोने के दाम बढ़ने की संभावना लगभग नहीं है, यह भी याद रखना चाहिए।
साभार: हिन्दुस्तान
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में अचानक तेज गिरावट आई है। पिछले कुछ वक्त से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम भी काफी कम चल रहे हैं और आने वाले वक्त में उनके ज्यादा तेज होने की कोई आशंका फिलहाल नहीं दिखती। अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु समझौते से यह संभावना काफी मजबूत हो गई है कि ईरान पर से प्रतिबंध हटेंगे और ईरानी कच्चा तेल भी बाजार में आ जाएगा। भारत के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का है, इसलिए तेल के दाम घटने से आयात-निर्यात संतुलन या चालू खाते का हिसाब बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। आयात में दूसरा सबसे बड़ा बोझ सोने का होता है और सोने के दामों में कमी से इसका आयात बिल भी कम होगा। पहले ही पिछले साल के मुकाबले सोने का आयात इस तिमाही में कम हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में अप्रैल से जून के बीच 221 टन सोना आयात हुआ था, जिसकी कीमत 54,800 करोड़ रुपये थी। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 203 टन सोना देश में आयात हुआ है, जिसकी कीमत 46,000 करोड़ रुपये है।
सोने के दामों में तेज गिरावट की कई वजहें हैं। पहली वजह तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के दामों में रिकॉर्ड तेजी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से बेहतरी की ओर बढ़ रही है। ऐसे में, डॉलर तेजी से ऊपर जा रहा है। सामान्य नियम यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में कमी का सीधा रिश्ता अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर से है। जब भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो अपनी स्थिति सुरक्षित करने के लिए वित्तीय संस्थान और निवेशक डॉलर बेचकर सोने की खरीद करने लगते हैं, जिससे सोने के दाम बढ़ने लगते हैं। सन 2008 की आर्थिक मंदी के बाद इसीलिए सोने के दाम आसमान छूने लगे थे। जैसे-जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभलने लगी, सोने के दामों में कमी आने लगी। फिलहाल डॉलर के दामों में तेज उछाल की वजह यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व यानी वहां की केंद्रीय मुद्रा नियंत्रक एजेंसी की अध्यक्ष जेनेट येलेन ने यह घोषणा की है कि इस साल के अंत में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की खरीदारी तेज हो गई और उसके दाम बढ़ गए। इसके परिणामस्वरूप चीनी व्यापारियों ने काफी सारा सोना बेचने के लिए बाजार में डाल दिया और सोने के दाम पिछले पांच साल में सबसे निचले स्तर पर आ गए। चीन सोने का सबसे बड़ा ग्राहक है, क्योंकि चीन में भी सोने को लेकर कुछ उसी तरह का आकर्षण है, जैसे भारत में है। ऐसे में, चीन अगर बड़े पैमाने पर सोना बेचने लगे, तो कीमतों का गिरना स्वाभाविक है। इसके अलावा धीरे-धीरे शेयर बाजार में लोगों का विश्वास फिर से जमने लगा है और लोग उसमें निवेश करने लगे हैं, जिससे सोने की मांग कम हुई है।
जब दुनिया में सोने के दाम बढ़ते हैं, तब भी भारतीय सोना खरीदते हैं और दाम कम होते हैं, तब भी वे इसे खरीदने का अच्छा मौका समझते हैं। इसी वजह से सोने का दाम घट जाने से भारत में आभूषणों का व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियों के शेयर चढ़ गए हैं। सोने के दाम घटने से उनकी लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। इसके अलावा इससे यह भी उम्मीद बनी है कि सोने के आयात पर लगे प्रतिबंध कुछ ढीले पड़ेंगे। वैसे भी अब त्योहारों का मौसम बहुत दूर नहीं है। भारतीयों के सोने के प्रति आकर्षण के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। हालांकि भविष्य में जल्दी ही सोने के दाम बढ़ने की संभावना लगभग नहीं है, यह भी याद रखना चाहिए।
साभार: हिन्दुस्तान
सिविल सेवा परीक्षा : उत्तराखंड
रचिता जुयाल ने 215वीं,, आदित्य ममगाईं ने 308वीं,विवेक नौटियाल ने 1038वीं रैंक ,लैंसडौन के पराग अग्रवाल ने 612वीं रैंक, आशीष रावत ने 1126वीं, पुष्पांजलि रावत ने 1176वीं और विकास नेगी ने 1189वीं रैंक and स्तुति घिल्डियाल यूपीएससी परीक्षा में
- 214 वीं रैंक हासिल की है।
रचिता जुयाल, दून के मोथरोवाला रोड स्थित अमन विहार निवासी सीबीसीआईडी इंस्पेक्टर बीबीडी जुयाल की बेटी हैं।vआईआरडीई में वैज्ञानिक आदित्य, नकरौंदा स्थित अलकनंदा विहार निवासी पूर्व अनुसचिव बुद्धि बल्लभ ममगाईं के बेटे हैं।विवेक , रेसकोर्स निवासी दून अस्पताल में आयुष चिकित्सक डॉ. जेएन नौटियाल के बेटे है। विवेक इससे पहले आईआईडी खड़गपुर में टॉपर रह चुके हैं.
रचिता जुयाल ने 215वीं,, आदित्य ममगाईं ने 308वीं,विवेक नौटियाल ने 1038वीं रैंक ,लैंसडौन के पराग अग्रवाल ने 612वीं रैंक, आशीष रावत ने 1126वीं, पुष्पांजलि रावत ने 1176वीं और विकास नेगी ने 1189वीं रैंक and स्तुति घिल्डियाल यूपीएससी परीक्षा में
- 214 वीं रैंक हासिल की है।
रचिता जुयाल, दून के मोथरोवाला रोड स्थित अमन विहार निवासी सीबीसीआईडी इंस्पेक्टर बीबीडी जुयाल की बेटी हैं।vआईआरडीई में वैज्ञानिक आदित्य, नकरौंदा स्थित अलकनंदा विहार निवासी पूर्व अनुसचिव बुद्धि बल्लभ ममगाईं के बेटे हैं।विवेक , रेसकोर्स निवासी दून अस्पताल में आयुष चिकित्सक डॉ. जेएन नौटियाल के बेटे है। विवेक इससे पहले आईआईडी खड़गपुर में टॉपर रह चुके हैं.
कुमाऊ केसरी
कुली उतार व बेगार के लिए कुमाऊ केसरी ने लड़ी लड़ाई
स्वतंत्रता से पहले कुली बेगार व उतार की समस्या से हर कोई परेशान था लेिकन अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने से हर कोई घबरा रहा था। इसी समय अल्मोड़ा अखबार ने जुलाई , 1874 के अंक में बेगार से होने वाली समस्याओं को बताते हुए इसे समाप्त करने का निवेदन किया। दस वर्ष पश्चात 22 सितंबर 1884 के अंक में लिखे लेख से अल्मोड़ा अखबार की कुली बेगा संबंधी अस्पष्ट नीति प्रकट होती है।
‘ विचार कर देखा जाए तो कुलियों के पक्ष या विपक्ष में लिखने को बुद्धि काम नहीं करती बाजे गरीब लोग जिनका भारी परिवार होता है, वे तो कुलियों की मांग होने पर प्रसन्न होते हैं।
कुली बेगार आंदोलन
भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊं की स्थिति देश के अन्य क्षेत्रों से भिन्न थी। अंग्रेजों के शोषण का स्वरूप भी यहां अन्य क्षेत्रों से भिन्न था। देश के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कुमाऊं में सुगम मार्गों व यातायात साधनों के अभाव के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना तथा सामान ले जाना अत्यधिक दुष्कर था। फलत: यहां कुली प्रथा का प्रचलन हुआ। प्रारंभ में शारीरिक दृष्टि से अक्षम व्यक्तियों के सामान को सक्षम व्यक्तियों के द्वारा ढोने के लिए बनी इस प्रथा ने धीरे-धीरे गरीबों पर अमीरों और शासक वर्ग का प्रभुत्व स्थापित किया। कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश के तीन रूपों में कुली ने अत्यंत अमानवीय स्वरूप धारण कर लिया था। विभिन्न अधिकारियों, पर्यटकों, शिकारियों, सैनिकों, सर्वे दलों आदि की यात्रा के समय यहां के ग्रामवासियों को सामान ढोने तथा पड़ाव पर उनके लिए विभिन्न प्रकार की आवश्यक सामग्री का प्रबंध करना पड़ता था। कुली बेगार मजदूरी रहित जबरन श्रम था, पर कुली उतार में न्यूनतम मजदूरी दी जाती थी। कुलियों के सिर पर तथा पीठ पर घृणित सामग्री, झाड़ू, कमोड, पाट, गोमांस, कुत्ते, अंडे, मुर्गी आ दि के साथ-साथ महिलाओं, बच्चों और नौकरों तक को लादा जाता था। किसी प्रकार का नुकसान होने पर जैसे अंडे टूटने या मुर्गी के मर जाने पर कुली को दंड भी भोगना पड़ता था। कुली बर्दायश के अधीन विभिन्न सरकारी कर्मचारियों, सैनिकों, पर्यटकों आदि के लिए सब्जी, घी, घास, लकड़ी, दूध, नमक मसाला, चीनी, तेल, चटाई, या पराल आदि का प्रबंध करना पड़ता था।
जारी है...
साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों की चिंता में डूबे दो दिन
देश के वरिष्ठ साहित्यकारों व पत्रकारों ने पत्रकारिता से साहित्य को हाशिये पर धकेल दिए जाने को अफसोसनाक बताया। लेकिन उन्होने सोशल मीडिया को आशा की नई किरण बताया, साथ ही शंका भी जाहिर
साहित्य अकादमी व उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहुंचे देश भर के साहित्यकार व पत्रकार
देश के वरिष्ठ साहित्यकारों व पत्रकारों ने पत्रकारिता से साहित्य को हाशिये पर धकेल दिए जाने को अफसोसनाक बताया। लेकिन उन्होने सोशल मीडिया को आशा की नई किरण बताया, साथ ही शंका भी जाहिर की कि इसमें भी साहित्य के बहस का स्तर गिर रहा है। सभी ने साहित्य का स्तर ऊंचा उठाने के लिए एकजुटता की बात की। हल्द्वानी में साहित्य अकादेमी और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आये विद्वतजनों ने अपनी-अपनी राय जाहिर की। साहित्यकारों का कहना था कि विश्व स्तर पर मीडिया पर विज्ञापनों का दबाव बढ़ने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता हाशिए पर चली गयी है, जो कि देश और समाज के लिए बेहद निराशाजनक है। संगोष्ठी में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र का कहना था कि सारी दुनिया में साहित्य को जनता तक सरल रूप में पहुंचाने का काम पत्रकारिता ही करती रही है। साहित्य के दर्जनों नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। हिन्दी में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली गद्य का विकास हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से ही किया। साथ ही दुनियाभर के मुद्दों से पाठकों को परिचित करवाया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तिलक और गांधी जी ने प्रतिरोध की पत्रकारिता की, जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा। उस समय पत्रकारिता ने ही सबसे पहले स्वदेशी और बंगाल विभाजन जैसे ज्वलंत मुद्दों को उठाया था। साहित्यिक पत्रकारिता ही उस समय मुख्य धारा की पत्रकारिता थी। लेकिन आज हालात एकदम बदल गये हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी मजबूत बना दी थी कि लोग अखबार में लिखी गई खबर को झूठ मानने को तैयार ही नहीं होते थे। बाद के दौर में विज्ञापनों के दबाव के चलते साहित्यिक पत्रकारिता हाशिए पर जाने लगी. दुर्भाग्य से किसी ने इसका विरोध नहीं किया। यही वजह है कि एक-एक कर हिंदी की नामी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो गईं।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति सुभाष धुलिया का कहना था कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद के आने के बाद से मीडिया में अपराध, सेक्स और दुर्घटनाओं की खबरों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। इसका कारण यह है कि इसे साधारण पाठक भी सरलता से समझ लेता है, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता को समझने में उसे कुछ मुश्किल आती है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि संपादकीय और साहित्यिक पृष्ठ पढ़नेवाले 10-12 प्रतिशत पाठक ही समाज का नेतृत्व करते हैं। इसलिए संचार माध्यमों में साहित्यिक और वैचारिक सामग्री को रोका नहीं जा सकता है. मुक्त अर्थव्यवस्था आने के बाद से मीडिया में संपादक की जगह ब्रांड मैनेजर लेने लगे। ये मैनेजर अखबार को ऐसा उत्पाद बनाने लगे जिसे विशाल जनसमूह खरीदें। इस वजह से साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्श हाशिए पर चले गए। पत्रकारिता सेवा से व्यापार में बदल गई। इसका उद्देश्य मुनाफा कमाना बन गया। इसी वजह से समाचार उत्पाद बन कर रह गया। पत्रकारिता का उद्देश्य विवेकशील नागरिक बनाना न होकर ज्यादा क्रय शक्ति वाला उपभोक्ता बनाना हो गया। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया अब असंतोष और असहमति को अभिव्यक्ति देने का काम कर रहा है, लेकिन इंटरनेट जैसे माध्यम की पहुंच अभी जनसंचार के माध्यमों की तरह नहीं है।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्या शाखा के निदेशक प्रो. गोविंद सिंह ने साहित्य पत्रकारिता के हो रहे ह्रास पर अपने विचार रखे। उनका कहना था कि बाजारवाद के हावी हाने के कारण ही आज साहित्यिक पत्रकारिता इस स्तर पर पहुंची है। उन्होंने यह भी कहा कि संगोष्ठी में कई ऐसे मुद्दे उठे जिन पर आगे शोध या संगोष्ठियां हो सकती हैं। जानेमाने पत्रकार एवं कवि मंगलेश डबराल का कहना था कि पत्रकारिता इतिहास का पहला ड्राफ्ट होती है और साहित्यिक रचना अंतिम ड्राफ्ट होती है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में हत्या, बलात्कार, आपदा और झगड़े की खबरें भी मनोरंजन बन गई हैं। हिंदी पत्रकारिता हिंदी साहित्य से ही निकली है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर रघुवीर सहाय तक साहित्यकारों ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया। हिन्दी के जाने-माने कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि केवल बाज़ार को कोसने से कुछ नहीं होगा। बाज़ार तो हजारों वर्षों से हमारी संस्कृति का अंग रहा है. यह भी सच है कि वैश्विक बाजार से हमारे स्थानीय बाज़ार को पंख लगे हैं। इसलिए बाजार का नहीं, अनैतिक बाजार का विरोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि महान साहित्यकारों ने भी पत्रकारिता के जरिये ही साहित्य में कदम रखे.उन्होंने मार्खेज और अर्नेस्ट हेमिंग्वे का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह से पत्रकारिता में उन्होंने साहित्य का पहला पाठ सीखा. वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार राजकिशोर का कहना था कि साहित्य, पत्रकारिता और मीडिया तीन पीढ़ियां हैं। उन्होंने कहा कि यह भ्रम है कि साहित्य मीडिया को नहीं समझ सकता है। साहित्य में मीडिया पर कई किताबें लिखी गई हैं। जब से खबर देना पेशा बना है, तब से ही खबर देनेवाला अपने हितों को साधने के लिए इसे इस्तेमाल करने लगा है। साहित्य कपड़ा, खिलौना या फिल्म उद्योग की तरह नहीं है। यह समस्या को समझने में मदद करता है, समाज की समझ बनाता है। साहित्य में मनोरंजन कम नहीं है। साहित्य अतुल्य है। पत्रकारिता में यदि साहित्य नहीं होगा तो सिर्फ मनोरंजन ही रह जाएगा।
साहित्यकार डॉ. प्रयाग जोशी ने कहा कि अखबार के बाद रेडियो ही आकर्षित करता है. क्योंकि वह हमारे कामकाज में व्यवधान नहीं डालता. आज भी उसमें बहुत अच्छे और शिक्षाप्रद कार्यक्रम आते हैं। लेकिन टेलीविजन और अन्य मीडिया इसे दबाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का अपना अलग महत्व है।सबसे पहले इसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 10 लाख के सूट का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि एक जमाना था जब साहित्य से पहला परिचय करवाने का काम पत्रकारिता ही करती थी, अब यह नहीं हो रहा. डॉ चन्द्र त्रिखा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए पत्रकारों की शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि इस दौर में बड़े अखबार समूहों ने घुटने टेक दिए थे। लेकिन छोटे अखबार और साहित्यिक पत्रिकाएं झुकी नहीं। उन्होंने कहा कि बाजार की चुनौती को हौवा नहीं बनाना चाहिए। प्रसार संख्या बढ़ाना इसका एक तोड़ हो सकता है। लाइव इंडिया वेबसाईट की सम्पादक गीताश्री ने मीडिया पर दोष मढने वाले साहित्यकारों को आडे हाथों लिया। उन्होंने मीडिया और साहित्य को दो अलग धाराएं बताया। उनका कहना था कि साहित्यकार साहित्यिक शुचितावाद को पकड़े हुए हैं। जबकि ज़माना आगे बढ़ गया है. पुराने मूल्यों के नष्ट होने पर ही नए मूल्य आएंगे।
वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि पंकज सिंह ने कहा कि साहित्य लिखने वालों को पत्रकार नहीं माना जाता। साहित्यिक पत्रकारिता और राजनीतिक पत्रकारिता दोनों अलग-अलग चीजें हैं. अखबार में सभी वर्गों को जगह मिलनी चाहिए। अखबार सिर्फ साहित्य से नहीं भरा जा सकता है। पत्रकार एवं साहित्यकार रामकुमार कृषक ने समसामयिक साहित्यिक पत्रिकाओं की सीमाओं और संभावनाओं पर चर्चा की और कहा कि इन पत्रिकाओं को प्रकाशित करना साहस और संकल्प का छोटी पूंजी का बड़ा उद्यम है। जबकि वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय, साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी व पत्रकार एवं साहित्यकार श्याम कश्यप का कहना था कि पत्रिकाओं को प्रासंगिक होना चाहिए। जिस पत्रकारिता का अपना व्यक्तित्व होता है, वे ही प्रासंगिक बन सकती हैं। उन्होंने समाज में पढने की रूचि घटते जाने पर खेद प्रकट किया। हल्द्वानी में हुई यह संगोष्ठी मुक्त मंडी के इस दौर में भुला दिए गए साहित्य को नया जीवन देने में इसलिए भी कामयाब रही कि दोनों दिन बड़ी संख्या में कुमाऊँ भर से लोग श्रोता बन बैठे रहे.
संगोष्ठी/ राजेंद्रसिंह क्वीरा
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