देश-विदेश की दिनभर की बड़ी खबरें


अमित शाह बोले, 'कसाब ने 'क'-कांग्रेस, 'स'-सपा, 'ब'-बसपा, यूपी का बंटाधार किया'
सुल्तानपुर: यूपी की चुनावी जंग में कब्रिस्तान, श्मशान, रमजान, होली, दिवाली और गधे के बाद अब कसाब की एंट्री हो गई है. बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी लड़ाई में नया रंग भरते हुए कहा कि ‘कसाब’ ने यूपी का बंटाधार कर रखा है.
अखिलेश का बड़ा बयान, ‘परिवार में झगड़ा न होता तो कांग्रेस से गठबंधन भी नहीं होता’
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बड़ा बयान दिया है. अखिलेश ने एक अंग्रेजी अखबार से कांग्रेस-सपा गठबंधन होने की वजह बताई है. अखिलेश ने कहा है कि अगर परिवार में झगड़ न होता तो कांग्रेस से गठबंधन भी नहीं होता.
तीन महीने में एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट ना लगाने वाले उद्योग की बिजली काट दी जाए: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: बिना सफाई नदियों और तालाबों में औद्योगिक कचरा डालने वालों की अब खैर नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 3 महीने में जो उद्योग एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट न लगाएं, उनकी बिजली सप्लाई काट दी जाए.
वरुण गांधी के 'बागी' बोल, 'कर्ज पर किसानों ने आत्महत्या की, माल्या पैसे लेकर भागा'
लखनऊ : उत्तर प्रदेश में सियासत गरम है और सियासी दलों के बीच जुबानी जंग चल रही है. इस बीच अब पार्टी के अंदर भी बगावती बयानों की शुरूआत हो गई है. बीजेपी के सांसद वरुण गांधी ने जो भाषण दिया है उसके तेवर बागी नजर आ रहे हैं.
यूपी : 'अपमान' हुआ तो नई पार्टी बनाएंगे शिवपाल, 'सम्मान' मिला तो सपा में रहेंगे
लखनऊ : उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान मचा हुआ है. इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के कुनबे में भी कलह जारी है. चुनावी रैलियों से लेकर निजी बयानों तक के बीच घर का झगड़ा सामने आ रहा है.
दिल्ली: राजौरी गार्डन में बेटी संग महिला ने मचाया हंगामा, शोरूम में की तोड़फोड़
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के इलाके राजौरी गार्डन के एक मोबाइल शोरूम में जमकर हंगामा हुआ. मामला यह है कि मादीपुर में रहने वाली एक महिला और उसकी 2 बेटियों ने जमकर किया हंगामा किया. इतना ही नहीं दोनों ने मिलकर दुकान में मारपीट और तोड़फोड़ की.
3 लाख भारतीयों को छोड़ना पड़ सकता है US, ट्रम्प ने सख्त किए इमिग्रेशन रूल्स
वॉशिंगटन.अमेरिका में गैरकानूनी तरीके से रह रहे लाखों लोगों पर देश से बाहर किए जाने का खतरा पैदा हो गया है। इनमें ऐसे भी लोग शामिल हैं, जो ट्रैफिक रूल्स तोड़ने जैसे छोटे मामले में कभी अरेस्ट हुए हैं।
टेकऑफ से पहले टूटा एयरक्राफ्ट का विंडो ग्लास, 10 घंटे से एयरपोर्ट पर फंसे हैं पैसेंजर
पुणे.स्पाइस जेट के एक एयरक्राफ्ट की विंडो का कांच टेकऑफ से पहले टूट गया। ये एयरक्राफ्ट बुधवार सुबह 7.20 से पुणे एयरपोर्ट पर खड़ा है। जानकारी के मुताबिक, एयरक्राफ्ट की कॉकपिट विंडो का कांच टेकऑफ से कुछ ही पहले टूट गया। जैसे ही इसका पता लगा फ्लाइट को रोक लिया गया। खबर, लिखे जाने तक इसकी रिपेयरिंग जारी थी।
1000 का नोट लाने का कोई प्लान नहीं, छोटे नोटों की छपाई-सप्लाई पर जोर: सरकार
नई दिल्ली. इकोनॉमिक अफेयर्स सेक्रेटरी शक्तिकांत दास ने कहा है कि सरकार का 1000 रु. का नोट लाने का कोई प्लान नहीं है। हमारा फोकस इस बात पर है कि 500 रु. और छोटे नोटों का प्रोडक्शन और सप्लाई बेहतर तरीके से होती रहे।
बड़े भाई ने किया खुलासा- PM मोदी को बचपन में एक्टिंग का बहुत शौक था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमा मोदी ने पीएम के बचपन को लेकर कई दिलचस्प खुलासे किए हैं. सोमा मोदी बीजेपी के लिए पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में प्रचार कर रहे हैं. सोमा मोदी ने ये भी कहा कि राजनीति का स्तर गिर रहा है इसलिए राजनेता एक-दूसरे के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं.
नोटबंदी: बुजुर्गों ने जमा किए 5 लाख रुपये तो नहीं होगा अकाउंट वेरिफिकेशन
आयकर विभाग 70 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों द्वारा नोटबंदी के बाद उनके खातों में पांच लाख रुपये तक की जमा पर आगे कोई सत्यापन नहीं करेगा. हालांकि, अन्य लोगों के लिए यह सीमा 2.5 लाख रुपये रखी गई है.
नोटबंदी का कितना किया प्रचार? पीएम ने मंत्रियों से मांगा हिसाब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मंत्रियो से नोटबंदी के प्रचार के लिए किए गए उनके प्रयास का ब्यौरा मांगा है. उनसे इससे संबंधित यात्राओं का ब्योरा देने को कहा गया है.
aksharam ki aur 
देश में खेल संस्कृति को करें विकसित
आज खेल दिवस है कल नहीं रहेगा।
अब एक साल बाद ही आएगा। लेकिन खेल दिवस पर खेलों से जुड़े विभिन्न संगठनों की दुकान आज जरूर चलेगी। इन दुकानों पर सम्मान, अवार्ड, प्रमाणपत्र के अलावा खेल सामग्री भी खूब बिकेगी। खरीदार भी हम और आप ही होंगे। इन दुकान चलाने वालों को भी पता है कि अपने दुकान की ब्रांडिंग कैसे करनी है। बस सालभर खेल और खिलाड़ियों के नाम पर पैसे वसूलो और फिर खेल दिवस पर अपनी दुकान चला लो। दुकान चलाने के नाम पर जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर के अपने शहर के या फिर आसपास के जिलों के खिलाड़ियों को सम्मानित कर दो। बस खेल एसोसिएशन और एकेडमियों की दुकान चमक उठेगी।
शहर ही नहीं पूरे देश में ऐसे हजारों, लाखों खेल संगठन होंगे।इनमें से तो एक व्यक्ति ही कई संगठन चला रहा होगा। लेकिन कितने खिलाड़ी संगठनों, संस्थाओं से निकलते है यह सब जानते है। ये खिलाड़ियों के नाम पर जिस खेल को खेल रहे है उन पर लगाम लगानी होगी। और खिलाड़ियों के भविष्य को बचाना होगा। नहीं तो इस बार तो रियो ओलंपिक में दो पदक आ गए लेकिन अगली बार का पता नहीं। आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाली हॉकी टीम को भी एयरपोर्ट पर पीछे का रास्ता देखना पड़ जाता है। देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए खेल संस्कृति को विकसित करना होगा। और इसे आदत बनानी होगी।
खिलाड़ियों को आधारभूत सुविधाएं मिले। और देश में खेल संस्कृति का विकास हो। यहीं खेल दिवस पर मेजर ध्यानचंद के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगा।

बिहार में टूटने-जुड़ने का समय


कस्बाई और गंवई जनता के पास अपनी एक अलग भाषा और समझदारी होती है, खासकर राजनीति और चुनाव प्रक्रिया के लिए। हर घटना और हर प्रक्रिया के लिए उनके पास अलग शब्द होते हैं। उनकी भाषा अक्सर राजनेताओं से अलग होती है, अकादमिक दुनिया के लोगों से तो खैर अलग होती ही है। अभी बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, मगर चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दल जुट गए हैं। धन की व्यवस्था, कार्यकर्ताओं को गोलबंद करना, दल-बदल, वगैरह चुनाव पूर्व की सारी कवायदें तेज हो चुकी हैं। पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में जब हम बिहार के हाजीपुर और उसके आस-पास के इलाके में घूमे, तो पता लगा कि वहां गांवों के लोग इस दौर को ‘टूटने-जुड़ने का समय’ कहते हैं।
यह समय उनके लिए ‘टूटने-जुड़ने’ का इसलिए है, क्योंकि यह उन्हें जो लाभ हुआ, जो हानि हुई, जो उन तक पहुंचा, जो नहीं पहुंंचा, जो उनके दुख-सुख में साथ रहा, जो नहीं आया और जिसने उनकी लड़ाई लड़ी, ऐसी बातों पर सोचकर अपना मन बनाने और मन बदलने का समय है। अभी आक्रामक चुनाव प्रचार तेज नहीं हुआ है, नेताओं का आना-जाना अभी ज्यादा शुरू नहीं हुआ है, आम जनता को समझाने, रिझाने, ललचाने के आक्रामक प्रयास भी अभी शुरू नहीं हुए हैं। ऐसे में, यह आत्ममंथन आसान है। यही समय है, जब आम लोगों का आपसी राजनीतिक संवाद शुरू होता है। जिस जनता को हम अनपढ़, निरक्षर और वोट की राजनीति में जाति, धर्म और तमाम फायदों के दबाव में आकर मत देने वाली प्रजा मानते हैं, वह इसी ‘टूटने-जुड़ने’ के समय में अपने दैनिक जीवन के संघर्षों में रहते हुए आत्मनिरीक्षण करती है। इसी वक्त किसी दल से जुड़ा कार्यकर्ता और नेता दूसरे दल के कार्यों की तारीफ करता दिख जाता है। जो जाति या समूह पिछले चुनाव में किसी खास दल को वोट दे चुका होता है, वह उससे अपने असंतोष का बयान कर रहा होता है। यानी यही वह समय है, जब आम लोगों के विमर्श में वह तनाव आकार लेने लगता है, जिसे हम बाद में ‘अंडर करंट’ कहते हैं।
हाजीपुर के पास सैदुल्लापुर के शंभु पासवान दलित जाति से हैं, राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के स्थानीय युवा नेता हैं। बात शुरू होने पर पहले तो कहते हैं कि भाजपा को एक बार बिहार में भी देखना चाहिए। फिर जब बात आगे बढ़ती है, तो थोड़ी ही देर में वह जनतांत्रिक राजनीति में दलगत हितों से ऊपर उठकर अपने सामाजिक हितों के आधार पर मूल्यांकन शुरूकर देते हैं। वह कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में हम लोगों ने मोदी जी को जिताया, पर हम तक कुछ नहीं पहुंचा। स्वच्छता अभियान, मेक इन इंडिया, विदेश यात्राएं, ये सब हम गांव-कस्बे वालों के लिए क्या अर्थ रखता है? फिर वह कहते हैं कि हमारी पार्टी वैसे तो भाजपा के साथ है, लेकिन हम लोगों को चलने, बोलने और खाट पर बैठने का अधिकार तो लालू जी ने ही दिया और नीतीश जी ने स्थानीय शासन में हम लोगों की भागीदारी दी। पैसे वालों और बड़े लोगों के शासन में हम सबका क्या भला होगा? उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह आगामी चुनाव में किसे वोट देंगे, पर वह अपने मन की बात कह गए। यह टूटने-जुड़ने के समय में ही संभव है, जब लोग आक्रामक प्रचार व नेताओं के तरह-तरह के दबाव से मुक्त होकर आत्मनिरीक्षण कर अपने मन में विचार कर रहे हैं। अगर वे कहें कि अभी तो चुनाव में देर है, अभी क्या कहें, तो भ्रम में न पड़िए कि उनके भीतर कुछ नहीं घटित हो रहा। एक राजनीतिक प्रक्रिया उस वक्त भी उनके भीतर चल रही होती है। चुनाव प्रचार तेज होने पर आधार तल की जनता या तो चुप रहती है, धीमे से बोलती है या हमें भ्रम में डालने वाली उलटबांसियां सुना देती है।
दूसरी घटना बिहार के वैशाली की है। लालू यादव द्वारा अपने बेटे को वैशाली से विधानसभा उम्मीदवार घोषित करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक समूह अपनी पार्टी की आलोचना करता दिखता है। ऐसे कार्यकर्ता लालू यादव के पुत्र-पुत्री प्रेम के प्रति अति कटु दिखते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह आगामी चुनाव में भाजपा को वोट दें ही। अभी चीजें तय हो रही हैं, यह ‘टूटने-जुटने’ का समय है, खरामा-खरामा उनके मन में चीजें बन रही हैं, नागरिक और गंवई व्यक्ति अभी ‘मतदाता’ में नहीं बदला है। चुनाव की घोषणा होते ही वह मतदाता में बदल जाएगा। उसका पक्ष तय होने लगेगा। अभी वह जनतांत्रिक राजनीति में अपने लाभ-हानि को सुन-गुन रहा है।
नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए यह ‘टूटने-जुड़ने’ की प्रक्रिया थोड़ा भिन्न ढंग से चल रही होती है। जो जातियां और सामाजिक समूह पिछले विधानसभा चुनाव में उनके ‘बेस वोट’ रहे थे, उनको तो महत्व दिया ही जा रहा है, साथ ही उन्हें भी महत्व दिया जा रहा है, जो पिछले चुनाव में उनसे दूर चले गए थे। नीतीश कुमार ने बिहार में दलितों की राजनीति में महादलित की राजनीति विकसित की थी, लेकिन अब उसमें से ‘मांझी फैक्टर’ के कारण ‘मुसहर’ मत उनसे टूट सकता है। यह भांपकर दलित और महादलित कोटि की अन्य जातियों को जोड़ने में उनके नेता जुट गए हैं। हाल में हुए बिहार विधान परिषद के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की बढ़त ने जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व वाले महागठबंधन को अपने सामाजिक समीकरणों को और दुरुस्त करने का दबाव तो दे ही दिया है।
अभी हाल ही में जगजीवन राम की 29वीं पुण्यतिथि पर नीतीश कुमार और लालू यादव ने आरा के समीप चंदवा स्थित बाबूजी की समाधि पर जाकर नमन किया। साल 1990 के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव ने पहली बार एक साथ इस प्रार्थना सभा में शिकरत की। यह हम सभी जानते हैं कि बिहार के दलित मन में बाबू जगजीवन राम की कितनी प्रतीकात्मक छवियां मौजूद हैं। उन्हें लगता है कि कुछ दलित जातियों के मतदाताओं का मन उनकी इस प्रतीकात्मक सक्रियता से उनके पक्ष में एकजुट हो सकता है। कांग्रेस और उसकी नेता व जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार भी इस महागठबंधन में शामिल हैं ही। फलत: कुछ टूट रहे हैं, तो कुछ को जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। यह अभी देखना होगा कि इस तरह की राजनीति उस जनता के राजनीतिक विमर्श पर कैसा असर दिखाती है, जिसके लिए यह टूटने और जुड़ने का समय है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) साभार: हिन्दुस्तान

मंद पड़ती चमक

मंद पड़ती चमक
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में अचानक तेज गिरावट आई है। पिछले कुछ वक्त से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम भी काफी कम चल रहे हैं और आने वाले वक्त में उनके ज्यादा तेज होने की कोई आशंका फिलहाल नहीं दिखती। अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु समझौते से यह संभावना काफी मजबूत हो गई है कि ईरान पर से प्रतिबंध हटेंगे और ईरानी कच्चा तेल भी बाजार में आ जाएगा। भारत के आयात में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का है, इसलिए तेल के दाम घटने से आयात-निर्यात संतुलन या चालू खाते का हिसाब बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। आयात में दूसरा सबसे बड़ा बोझ सोने का होता है और सोने के दामों में कमी से इसका आयात बिल भी कम होगा। पहले ही पिछले साल के मुकाबले सोने का आयात इस तिमाही में कम हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में अप्रैल से जून के बीच 221 टन सोना आयात हुआ था, जिसकी कीमत 54,800 करोड़ रुपये थी। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 203 टन सोना देश में आयात हुआ है, जिसकी कीमत 46,000 करोड़ रुपये है।
सोने के दामों में तेज गिरावट की कई वजहें हैं। पहली वजह तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के दामों में रिकॉर्ड तेजी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से बेहतरी की ओर बढ़ रही है। ऐसे में, डॉलर तेजी से ऊपर जा रहा है। सामान्य नियम यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में कमी का सीधा रिश्ता अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर से है। जब भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो अपनी स्थिति सुरक्षित करने के लिए वित्तीय संस्थान और निवेशक डॉलर बेचकर सोने की खरीद करने लगते हैं, जिससे सोने के दाम बढ़ने लगते हैं। सन 2008 की आर्थिक मंदी के बाद इसीलिए सोने के दाम आसमान छूने लगे थे। जैसे-जैसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभलने लगी, सोने के दामों में कमी आने लगी। फिलहाल डॉलर के दामों में तेज उछाल की वजह यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व यानी वहां की केंद्रीय मुद्रा नियंत्रक एजेंसी की अध्यक्ष जेनेट येलेन ने यह घोषणा की है कि इस साल के अंत में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की खरीदारी तेज हो गई और उसके दाम बढ़ गए। इसके परिणामस्वरूप चीनी व्यापारियों ने काफी सारा सोना बेचने के लिए बाजार में डाल दिया और सोने के दाम पिछले पांच साल में सबसे निचले स्तर पर आ गए। चीन सोने का सबसे बड़ा ग्राहक है, क्योंकि चीन में भी सोने को लेकर कुछ उसी तरह का आकर्षण है, जैसे भारत में है। ऐसे में, चीन अगर बड़े पैमाने पर सोना बेचने लगे, तो कीमतों का गिरना स्वाभाविक है। इसके अलावा धीरे-धीरे शेयर बाजार में लोगों का विश्वास फिर से जमने लगा है और लोग उसमें निवेश करने लगे हैं, जिससे सोने की मांग कम हुई है।
जब दुनिया में सोने के दाम बढ़ते हैं, तब भी भारतीय सोना खरीदते हैं और दाम कम होते हैं, तब भी वे इसे खरीदने का अच्छा मौका समझते हैं। इसी वजह से सोने का दाम घट जाने से भारत में आभूषणों का व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियों के शेयर चढ़ गए हैं। सोने के दाम घटने से उनकी लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। इसके अलावा इससे यह भी उम्मीद बनी है कि सोने के आयात पर लगे प्रतिबंध कुछ ढीले पड़ेंगे। वैसे भी अब त्योहारों का मौसम बहुत दूर नहीं है। भारतीयों के सोने के प्रति आकर्षण के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है। हालांकि भविष्य में जल्दी ही सोने के दाम बढ़ने की संभावना लगभग नहीं है, यह भी याद रखना चाहिए।
साभार: हिन्दुस्तान
सिविल सेवा परीक्षा : उत्तराखंड 
रचिता जुयाल ने 215वीं,, आदित्य ममगाईं ने 308वीं,विवेक नौटियाल ने 1038वीं रैंक ,लैंसडौन के पराग अग्रवाल ने 612वीं रैंक, आशीष रावत ने 1126वीं, पुष्पांजलि रावत ने 1176वीं और विकास नेगी ने 1189वीं रैंक and स्तुति घिल्डियाल यूपीएससी परीक्षा में
- 214 वीं रैंक हासिल की है। 
रचिता जुयाल, दून के मोथरोवाला रोड स्थित अमन विहार निवासी सीबीसीआईडी इंस्पेक्टर बीबीडी जुयाल की बेटी हैं।vआईआरडीई में वैज्ञानिक आदित्य, नकरौंदा स्थित अलकनंदा विहार निवासी पूर्व अनुसचिव बुद्धि बल्लभ ममगाईं के बेटे हैं।विवेक , रेसकोर्स निवासी दून अस्पताल में आयुष चिकित्सक डॉ. जेएन नौटियाल के बेटे है। विवेक इससे पहले आईआईडी खड़गपुर में टॉपर रह चुके हैं.

कुमाऊ केसरी

कुली उतार व बेगार के लिए कुमाऊ केसरी ने लड़ी लड़ाई 

स्वतंत्रता से पहले कुली बेगार व उतार की समस्या से हर कोई परेशान था लेिकन अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने से हर कोई घबरा रहा था। इसी समय अल्मोड़ा अखबार ने जुलाई , 1874 के अंक में बेगार से होने वाली समस्याओं को बताते हुए इसे समाप्त करने का निवेदन किया। दस वर्ष पश्चात 22 सितंबर 1884 के अंक में लिखे लेख से अल्मोड़ा अखबार की कुली बेगा संबंधी अस्पष्ट नीति प्रकट होती है।
‘ विचार कर देखा जाए तो कुलियों के पक्ष या विपक्ष में लिखने को बुद्धि काम नहीं करती बाजे गरीब लोग जिनका भारी परिवार होता है, वे तो कुलियों की मांग होने पर प्रसन्न होते हैं।
कुली बेगार आंदोलन
भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊं की स्थिति देश के अन्य क्षेत्रों से भिन्न थी। अंग्रेजों के शोषण का स्वरूप भी यहां अन्य क्षेत्रों से भिन्न था। देश के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कुमाऊं में सुगम मार्गों व यातायात साधनों के अभाव के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना तथा सामान ले जाना अत्यधिक दुष्कर था। फलत: यहां कुली प्रथा का प्रचलन हुआ। प्रारंभ में शारीरिक दृष्टि से अक्षम व्यक्तियों के सामान को सक्षम व्यक्तियों के द्वारा ढोने के लिए बनी इस प्रथा ने धीरे-धीरे गरीबों पर अमीरों और शासक वर्ग का प्रभुत्व स्थापित किया। कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश के तीन रूपों में कुली ने अत्यंत अमानवीय स्वरूप धारण कर लिया था। विभिन्न अधिकारियों, पर्यटकों, शिकारियों, सैनिकों, सर्वे दलों आदि की यात्रा के समय यहां के ग्रामवासियों को सामान ढोने तथा पड़ाव पर उनके लिए विभिन्न प्रकार की आवश्यक सामग्री का प्रबंध करना पड़ता था। कुली बेगार मजदूरी रहित जबरन श्रम था, पर कुली उतार में न्यूनतम मजदूरी दी जाती थी। कुलियों के सिर पर तथा पीठ पर घृणित सामग्री, झाड़ू,  कमोड, पाट, गोमांस, कुत्ते, अंडे, मुर्गी आ दि के साथ-साथ महिलाओं, बच्चों और नौकरों तक को लादा जाता था। किसी प्रकार का नुकसान होने पर जैसे अंडे टूटने या मुर्गी के मर जाने पर कुली को दंड भी भोगना पड़ता था। कुली बर्दायश के अधीन विभिन्न सरकारी कर्मचारियों, सैनिकों, पर्यटकों आदि के लिए सब्जी, घी, घास, लकड़ी, दूध, नमक मसाला, चीनी, तेल, चटाई, या पराल आदि का प्रबंध करना पड़ता था।
जारी है...

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