कुली उतार व बेगार के लिए कुमाऊ केसरी ने लड़ी लड़ाई
स्वतंत्रता से पहले कुली बेगार व उतार की समस्या से हर कोई परेशान था लेिकन अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने से हर कोई घबरा रहा था। इसी समय अल्मोड़ा अखबार ने जुलाई , 1874 के अंक में बेगार से होने वाली समस्याओं को बताते हुए इसे समाप्त करने का निवेदन किया। दस वर्ष पश्चात 22 सितंबर 1884 के अंक में लिखे लेख से अल्मोड़ा अखबार की कुली बेगा संबंधी अस्पष्ट नीति प्रकट होती है।
‘ विचार कर देखा जाए तो कुलियों के पक्ष या विपक्ष में लिखने को बुद्धि काम नहीं करती बाजे गरीब लोग जिनका भारी परिवार होता है, वे तो कुलियों की मांग होने पर प्रसन्न होते हैं।
कुली बेगार आंदोलन
भौगोलिक दृष्टि से कुमाऊं की स्थिति देश के अन्य क्षेत्रों से भिन्न थी। अंग्रेजों के शोषण का स्वरूप भी यहां अन्य क्षेत्रों से भिन्न था। देश के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कुमाऊं में सुगम मार्गों व यातायात साधनों के अभाव के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना तथा सामान ले जाना अत्यधिक दुष्कर था। फलत: यहां कुली प्रथा का प्रचलन हुआ। प्रारंभ में शारीरिक दृष्टि से अक्षम व्यक्तियों के सामान को सक्षम व्यक्तियों के द्वारा ढोने के लिए बनी इस प्रथा ने धीरे-धीरे गरीबों पर अमीरों और शासक वर्ग का प्रभुत्व स्थापित किया। कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश के तीन रूपों में कुली ने अत्यंत अमानवीय स्वरूप धारण कर लिया था। विभिन्न अधिकारियों, पर्यटकों, शिकारियों, सैनिकों, सर्वे दलों आदि की यात्रा के समय यहां के ग्रामवासियों को सामान ढोने तथा पड़ाव पर उनके लिए विभिन्न प्रकार की आवश्यक सामग्री का प्रबंध करना पड़ता था। कुली बेगार मजदूरी रहित जबरन श्रम था, पर कुली उतार में न्यूनतम मजदूरी दी जाती थी। कुलियों के सिर पर तथा पीठ पर घृणित सामग्री, झाड़ू, कमोड, पाट, गोमांस, कुत्ते, अंडे, मुर्गी आ दि के साथ-साथ महिलाओं, बच्चों और नौकरों तक को लादा जाता था। किसी प्रकार का नुकसान होने पर जैसे अंडे टूटने या मुर्गी के मर जाने पर कुली को दंड भी भोगना पड़ता था। कुली बर्दायश के अधीन विभिन्न सरकारी कर्मचारियों, सैनिकों, पर्यटकों आदि के लिए सब्जी, घी, घास, लकड़ी, दूध, नमक मसाला, चीनी, तेल, चटाई, या पराल आदि का प्रबंध करना पड़ता था।
जारी है...
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