बिहार में टूटने-जुड़ने का समय
कस्बाई और गंवई जनता के पास अपनी एक अलग भाषा और समझदारी होती है, खासकर राजनीति और चुनाव प्रक्रिया के लिए। हर घटना और हर प्रक्रिया के लिए उनके पास अलग शब्द होते हैं। उनकी भाषा अक्सर राजनेताओं से अलग होती है, अकादमिक दुनिया के लोगों से तो खैर अलग होती ही है। अभी बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं हुई है, मगर चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दल जुट गए हैं। धन की व्यवस्था, कार्यकर्ताओं को गोलबंद करना, दल-बदल, वगैरह चुनाव पूर्व की सारी कवायदें तेज हो चुकी हैं। पिछले दिनों अपने शोध के सिलसिले में जब हम बिहार के हाजीपुर और उसके आस-पास के इलाके में घूमे, तो पता लगा कि वहां गांवों के लोग इस दौर को ‘टूटने-जुड़ने का समय’ कहते हैं।
यह समय उनके लिए ‘टूटने-जुड़ने’ का इसलिए है, क्योंकि यह उन्हें जो लाभ हुआ, जो हानि हुई, जो उन तक पहुंचा, जो नहीं पहुंंचा, जो उनके दुख-सुख में साथ रहा, जो नहीं आया और जिसने उनकी लड़ाई लड़ी, ऐसी बातों पर सोचकर अपना मन बनाने और मन बदलने का समय है। अभी आक्रामक चुनाव प्रचार तेज नहीं हुआ है, नेताओं का आना-जाना अभी ज्यादा शुरू नहीं हुआ है, आम जनता को समझाने, रिझाने, ललचाने के आक्रामक प्रयास भी अभी शुरू नहीं हुए हैं। ऐसे में, यह आत्ममंथन आसान है। यही समय है, जब आम लोगों का आपसी राजनीतिक संवाद शुरू होता है। जिस जनता को हम अनपढ़, निरक्षर और वोट की राजनीति में जाति, धर्म और तमाम फायदों के दबाव में आकर मत देने वाली प्रजा मानते हैं, वह इसी ‘टूटने-जुड़ने’ के समय में अपने दैनिक जीवन के संघर्षों में रहते हुए आत्मनिरीक्षण करती है। इसी वक्त किसी दल से जुड़ा कार्यकर्ता और नेता दूसरे दल के कार्यों की तारीफ करता दिख जाता है। जो जाति या समूह पिछले चुनाव में किसी खास दल को वोट दे चुका होता है, वह उससे अपने असंतोष का बयान कर रहा होता है। यानी यही वह समय है, जब आम लोगों के विमर्श में वह तनाव आकार लेने लगता है, जिसे हम बाद में ‘अंडर करंट’ कहते हैं।
हाजीपुर के पास सैदुल्लापुर के शंभु पासवान दलित जाति से हैं, राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के स्थानीय युवा नेता हैं। बात शुरू होने पर पहले तो कहते हैं कि भाजपा को एक बार बिहार में भी देखना चाहिए। फिर जब बात आगे बढ़ती है, तो थोड़ी ही देर में वह जनतांत्रिक राजनीति में दलगत हितों से ऊपर उठकर अपने सामाजिक हितों के आधार पर मूल्यांकन शुरूकर देते हैं। वह कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में हम लोगों ने मोदी जी को जिताया, पर हम तक कुछ नहीं पहुंचा। स्वच्छता अभियान, मेक इन इंडिया, विदेश यात्राएं, ये सब हम गांव-कस्बे वालों के लिए क्या अर्थ रखता है? फिर वह कहते हैं कि हमारी पार्टी वैसे तो भाजपा के साथ है, लेकिन हम लोगों को चलने, बोलने और खाट पर बैठने का अधिकार तो लालू जी ने ही दिया और नीतीश जी ने स्थानीय शासन में हम लोगों की भागीदारी दी। पैसे वालों और बड़े लोगों के शासन में हम सबका क्या भला होगा? उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह आगामी चुनाव में किसे वोट देंगे, पर वह अपने मन की बात कह गए। यह टूटने-जुड़ने के समय में ही संभव है, जब लोग आक्रामक प्रचार व नेताओं के तरह-तरह के दबाव से मुक्त होकर आत्मनिरीक्षण कर अपने मन में विचार कर रहे हैं। अगर वे कहें कि अभी तो चुनाव में देर है, अभी क्या कहें, तो भ्रम में न पड़िए कि उनके भीतर कुछ नहीं घटित हो रहा। एक राजनीतिक प्रक्रिया उस वक्त भी उनके भीतर चल रही होती है। चुनाव प्रचार तेज होने पर आधार तल की जनता या तो चुप रहती है, धीमे से बोलती है या हमें भ्रम में डालने वाली उलटबांसियां सुना देती है।
दूसरी घटना बिहार के वैशाली की है। लालू यादव द्वारा अपने बेटे को वैशाली से विधानसभा उम्मीदवार घोषित करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक समूह अपनी पार्टी की आलोचना करता दिखता है। ऐसे कार्यकर्ता लालू यादव के पुत्र-पुत्री प्रेम के प्रति अति कटु दिखते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह आगामी चुनाव में भाजपा को वोट दें ही। अभी चीजें तय हो रही हैं, यह ‘टूटने-जुटने’ का समय है, खरामा-खरामा उनके मन में चीजें बन रही हैं, नागरिक और गंवई व्यक्ति अभी ‘मतदाता’ में नहीं बदला है। चुनाव की घोषणा होते ही वह मतदाता में बदल जाएगा। उसका पक्ष तय होने लगेगा। अभी वह जनतांत्रिक राजनीति में अपने लाभ-हानि को सुन-गुन रहा है।
नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए यह ‘टूटने-जुड़ने’ की प्रक्रिया थोड़ा भिन्न ढंग से चल रही होती है। जो जातियां और सामाजिक समूह पिछले विधानसभा चुनाव में उनके ‘बेस वोट’ रहे थे, उनको तो महत्व दिया ही जा रहा है, साथ ही उन्हें भी महत्व दिया जा रहा है, जो पिछले चुनाव में उनसे दूर चले गए थे। नीतीश कुमार ने बिहार में दलितों की राजनीति में महादलित की राजनीति विकसित की थी, लेकिन अब उसमें से ‘मांझी फैक्टर’ के कारण ‘मुसहर’ मत उनसे टूट सकता है। यह भांपकर दलित और महादलित कोटि की अन्य जातियों को जोड़ने में उनके नेता जुट गए हैं। हाल में हुए बिहार विधान परिषद के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की बढ़त ने जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व वाले महागठबंधन को अपने सामाजिक समीकरणों को और दुरुस्त करने का दबाव तो दे ही दिया है।
अभी हाल ही में जगजीवन राम की 29वीं पुण्यतिथि पर नीतीश कुमार और लालू यादव ने आरा के समीप चंदवा स्थित बाबूजी की समाधि पर जाकर नमन किया। साल 1990 के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव ने पहली बार एक साथ इस प्रार्थना सभा में शिकरत की। यह हम सभी जानते हैं कि बिहार के दलित मन में बाबू जगजीवन राम की कितनी प्रतीकात्मक छवियां मौजूद हैं। उन्हें लगता है कि कुछ दलित जातियों के मतदाताओं का मन उनकी इस प्रतीकात्मक सक्रियता से उनके पक्ष में एकजुट हो सकता है। कांग्रेस और उसकी नेता व जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार भी इस महागठबंधन में शामिल हैं ही। फलत: कुछ टूट रहे हैं, तो कुछ को जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। यह अभी देखना होगा कि इस तरह की राजनीति उस जनता के राजनीतिक विमर्श पर कैसा असर दिखाती है, जिसके लिए यह टूटने और जुड़ने का समय है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) साभार: हिन्दुस्तान
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